June 23, 2024

रैगर भाइयो जागो!

और दिमाग(IQ)लगाओ कि यदि रैगर भी रैदासजी के वंशज हैं तो यह कैसे संभव हो गया कि गत 600वर्षों में ही बनारस उत्तर प्रदेश के मूल निवासी रैदासजी की संतानों में से केवल राजस्थान के मूल निवासी रैगरों की जनसँख्या 11,00,000 (ग्यारह लाख) हो गई है?

भाइयो!

वास्तविकता यह है कि अपनी जाति को जाने अनजाने में सामाजिक, राजनैतिक और मानसिक नुकसान पहुंचाया जा रहा है।

यह तो सही नहीं है कि जो है या जो गलती गत 150वर्ष में रैगर जाति के सदस्यों के द्वारा की गयी है,उसको छिपाया जाय। लेकिन अब उसके प्रचार प्रसार करने का कोई लाभ भी नहीं है।जैसेकि बैरवा, मेघवाल भाइयों ने एक मानसिकता विशेष विकसित कर ली है।

भाइयो!आज का युग स्वतंत्रता और सामाजिक उत्थान का युग है। हर जाति और व्यक्ति को उसके पूर्वजों को महामण्डित करने का अधिकार है। अमेरिका के राष्ट्रपति रीगन ने भी ब्रिटेन में उनके पूर्वजों की तलाश करवाई थी।

लेकिन यह गलत है कि किसी भी बहाने किसी भी FACE BOOK or WEBSITEपर या किसी लेख में रैगर जाति और रैगर शब्द को गलत परिभाषित किया जाय या रैगर जाति की उत्पत्ति को गलत रूप से पैदा किया जायया रैगर जाति को चमार संवर्ग की जाति मानकर, उसके जनसंख्यात्मक आंकड़ों का गलत विश्लेषण किया जाय।

उधर सामान्यवर्ग के सामाजिक इतिहासकार भी गत 120-130 वर्षों से यह लिखते रहे हैंकि रैगर जाति के लोगों का ऐसा मानना है कि वे रैदासजी के वंशज हैं।यद्यपिउनके द्वारा कभी भी रैगरों की उक्त मान्यता की ऐतिहासिकता पर विचार नहीं किया है।लेकिन इस कथन में उनकी यह मूक स्वीकृति है कि रैगरों की सोच सही नहीं लगती है । जबकियदि राजस्थान का कोई मनचला या गलत फितरत का दलितबंधु गांवों के भोले भाले रैगरबंधुओं को यह कहे कि उसकी जाति से तो रैदासजी और रामदेवजी से कोई लेना देना नहीं है। क्योंकि रैदासजी रैगर थे तथा रामदेवजी रैगरों के कुलदेवता है। अतः रैगरों ने ही गांव गांव में रामदेवजी के मंदिर बनाये हैं और रैगर रैदासजी को अपना गुरु मानते हैं।

भाइयो! इस पर विचार करो। क्योंकि ऐसा कहकर, उसदलितबंधु ने अपने को रैगरों से ऊँचा बताने की कुचेष्टा की है।ऐसे दुष्प्रचारों का खुलकर विरोध करो।जबकि सामान्यवर्ग के किसी भी सामाजिक इतिहासकार के किसी भी ग्रन्थ में आधिकारिक तौर पर यह नही लिखा गया है कि रैदासजी रैगर थे या रैगर रैदासजी की औलाद है।दोयम ऐतिहासिक प्रमाण तो यह कहते हैं कि बाबा रामदेवजी और रैदास भक्त के जीवन काल में तो रैगर समुदाय सामान्यवर्ग था।लेकिन रैगर सामाजिक प्रतिष्ठा को जगह-जगह चोट पहुंचाई जा रही है।उदाहरणार्थ-

  1. एक दलितबंधु ने एक WEBSITE POSTकी है,उसके जरिये यह प्रचार करने का प्रयास किया है कि उसकी जाति तो CHAMAR CLUSTERकी जाति नहीं है,जबकि रैगर जाति CHAMAR CLUSTERकी जाति है।
  2. एक सामाजिक WEBSITEमें बैरवा और मेघवाल जाति को स्वंतत्र जातियां मानकर,उनका वर्णन किया है,जबकि रैगर जाति का वर्णन चमार शीर्षक के अंतर्गत किया है। यद्यपि उस WEBSITEमें ऐसा नहीं लिखा गया है कि रैगर जाति चमार जाति की उपजाति है। लेकिन उस की सबसे बड़ी कमी यह है कि उसने रैगर जाति की स्वतंत्र पहचान पर विचार नहीं किया है।
  3. Jogendra Nath Bhattacharya (1896). Hindu castes and sects: an exposition of the origin of the Hindu caste system and the bearing of the sects towards each other and towards other religious systems / Jogendra Nath Bhattacharyaमें108 वर्ष पूर्व यह लिखा गया था कि रैगर जाति ऐतिहासिक तौर पर नमक व्यवसाय से जुडी हुई जाति थी।ब्रिटिश भारत की सन् 1891 ईस्वी की जनगणना में भी रेहगर(रैगर) जाति को चर्मकार श्रेणी की जातियों के बाहर माना था तथा उसे चूना और नमक व्यवसायी जातियों की श्रेणी में रखा था।

लेकिन एक दलित विद्वान ने उनकी कृति में यह लिख दिया है कि रेह्गर एक गैर-रैगर जाति थी।जबकिउनकी कृति से इस बात का पता नहीं लगता है कि अब वह सन् 1891 ईस्वी कीवह रेह्गर जाति कहाँ है? अतः प्रश्न है किउनको रेह्गर शब्द को इस प्रकार से परिभाषित करने की क्यों आवश्यकता हुई थी? जबकि उसकी जाति अपने को क्षत्रियवंशी क्यों बताती है? इस पर विचार क्यों नहीं किया?

भाइयो सोचोऔर रैगर उत्थान की ओर कदम बढ़ाओ ।

C.L.Verma R.A.S. rtd

 

http://www.raigar.net/?page_id=170